तीनबत्ती वाले सच

लेखक: Nitesh Panwar | © trendingnews.in

देश की पारदर्शिता की लकीर खींचने वाला Right to Information Act, 2005 (RTI) फिर से चर्चा में है। इस बार तीन अलग-अलग मोर्चों से ऐसे खुलासे सामने आए हैं जो सरकार-प्रशासन की असहज हकीकत दिखाते हैं – एक तो अफीम का वितरण, दूसरा प्रदूषण नियंत्रण संस्था की कर्मचारी-कमी, तीसरा महाराष्ट्र में बढ़ती टेंडर घोटाले की गंध। आइए देखें कि ये क्या हैं, कैसे सामने आए और जनता के भरोसे को क्या झटका दे रहे हैं। तीनबत्ती वाले सच

1. अफीम का बेरहम सच: “नशेड़े हैं, पर आधिकारिक मदद भी”

बहुत कम लोग जानते हैं कि देश में कुछ नशेड़ियों को सरकार द्वारा **औषधीय अफीम** मुहैया कराई जाती है। यह खुलासा Central Bureau of Narcotics (CBN) के RTI जवाब में हुआ है, जिसमें बताया गया कि कुछ राज्यों को रजिस्टर-नशेड़ियों के लिए अफीम की मात्रा पहले से तय-मात्रा में दी जाती है। तीनबत्ती वाले सच

मसलन, वित्त वर्ष 2025–26 में तमिलनाडु को 7.763 किलो, ओडिशा को 14.628 किलो, हिमाचल प्रदेश को 0.624 किलो अफीम दी गई। इसी तरह 2024–25 में महाराष्ट्र को 26.142 किलो अलॉट हुआ था।

“औषधीय जरूरत = सरकारी भरोसा”-यह फार्मूला बेहद उलझा हुआ है। क्योंकि एक ओर सरकार कहती है कि नशे से लड़ना है, दूसरी ओर कुछ नशेड़ियों को हल्के-हल्के तरीके से अफीम बांट रही है। क़ानून में यह व्यवस्था है कि राज्यों द्वारा नशेड़ियों को अफीम “मेडिकल नीड” के अंतर्गत दिए जाएं। तीनबत्ती वाले सच

लेकिन सवाल उठता है: कितने लोग इस स्कीम में हैं? क्या हमारी निगरानी पुख्ता है? RTI जवाब में CBN ने स्पष्ट किया कि उन्हें रजिस्टर-नशेड़ियों की संख्या नहीं रखनी होती, सिर्फ राज्य सरकारों को मात्रा अलॉट करनी होती है।

यह खुलासा दर्शाता है कि सरकारी सिस्टम में एक ऐसा द्वैध चरित्र मौजूद है — नशे से लड़ने की बात होती है, लेकिन नशेड़ियों को आधिकारिक मदद भी दी जाती है। आम नागरिक के लिए यह भ्रम का स्त्रोत बन गया है। हालाँकि, चिकित्सा-और सामाजिक दृष्टि से यह कदम जहाँ सहायक हो सकता है, वहीं पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रश्न खड़े कर देता है। तीनबत्ती वाले सच

2. हवा के हमले के सामने अधूरी सुरक्षा: CPCB में स्टाफ की कमी

अब बारी आती है पर्यावरण की — Central Pollution Control Board (CPCB) की। जिस संस्था पर जनता भरोसा करती है कि वो उद्योगों-कारखानों को रुल्स का पालन कराएगी, उसमे खुद 22 % से अधिक पद खाली हैं — RTI जवाब के अनुसार। तीनबत्ती वाले सच

ऐसा ही हाल कई राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों का है — एक RTI में पता चला कि Uttarakhand Pollution Control Board सिर्फ 48 कर्मचारियों के साथ काम कर रही है जबकि उसकी स्वीकृत संख्या 130 थी, यानि करीब 63 % पद खाली।

इसका असर हम महसूस कर रहे हैं — शहरों में धुंध, जहरीली हवा, उद्योगों की मनमानी बढ़ती जा रही है। एक विशेषज्ञ ने कहा है कि खाली पदों के कारण तकनीकी, इंजीनियरिंग और मॉनिटरिंग की भूमिका कमजोर पड़ गई है। तीनबत्ती वाले सच

तो सवाल बनता है: जब “हवा खतरनाक है, सकते में घुसा है”, तब उस संस्था के पास ही आदमी नहीं होंगे जो नियम बनाएं-मानें और उल्लंघन पकड़ें? जवाब मिल रहा है: कम-कमी है, प्रक्रिया धीमी है।

और यह सिर्फ संख्या का खेल नहीं है — यह जीवन की सुविधा और स्वास्थ्य का मसला है। जब हवा छित्त-छित्त होती है, बच्चों की सासें चलने लगती हैं, तब हम कहते हैं “सरकार तो है”, लेकिन सामने आता है “कर्मचारी नहीं है”। इनमें कमी है, इसलिए जिम्मेदारी का बोझ कमजोर पड़ रहा है। तीनबत्ती वाले सच

3. महाराष्ट्र का ₹1500 करोड़ टेंडर विवाद: RTI ने पूछा सवाल, मीडिया ने पकड़ा रील

और अब तीसरी गोली — Sanjay Shirsat नामक मंत्री की अगुआई में महाराष्ट्र की Maharashtra Social Justice and Special Assistance Department में लगभग ₹1500 करोड़ के टेंडर घोटाले की शिकायत सामने आई है।

RTI वॉलंटियर ने आरोप लगाया है कि टेंडर को तीन कंपनियों में बांटा गया — SMART Services (पहले Brisk India), BVG India और Crystal Integrated Services — जिन्होंने बराबर 19.5 % सेवा शुल्क की बोली लगाई। इस एकरूपता को “कार्टेल की छाप” माना जा रहा है। तीनबत्ती वाले सच

इसके बाद Central Vigilance Commission (CVC) ने जांच आदेश जारी किया है जो इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है।

सरकार-विभाग टेंडर निकालते हैं ताकि जनता को सेवाएँ मिलें, लेकिन अगर प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं हो, तो बजट, सेवा, भरोसा — सब धड़ाम हो जाते हैं। यहाँ मामला साफ-साफ यही है।

और दिलचस्प बात यह है कि यह मामला सिर्फ वहाँ नहीं रुक रहा — सोशल मीडिया में फैल रहा है, RTI-माध्यमों ने उठाया है, इसलिए दबाव बढ़ रहा है। जनता पूछ रही है: ₹1500 करोड़ में कौन-कौन शामिल है? जिम्मेदार कौन बनेगा? जवाब कब आएगा? तीनबत्ती वाले सच

4. ये तीनों बातें कैसे जुड़ी हैं?

पहले लग सकता है कि ये तीन घटनाएँ अलग-अलग हैं — नशे और अफीम, प्रदूषण नियंत्रण की कमी, टेंडर घोटाले। लेकिन गहराई में देखें तो इन सबका बीच में एक ही धागा निकलता है: जिम्मेदारी का अभाव।

  • जब नशेड़ियों को अफीम बांटी जाती है, तो कहर है कि व्यवस्था बोझिल हो सकती है।
  • जब पर्यावरण का पहरेदार संस्था खुद क्षमता से कोसों दूर है।
  • जब ज़रूरी टेंडर में पारदर्शिता खो जाती है, जनता का भरोसा कम हो जाता है।

इन तीनों में जो सबसे बड़े दोष लगते हैं, वो हैं: निर्णय-प्रक्रिया में ढिलाई, जिम्मेदारियों का बंटवारा, और जवाबदेही का अभाव। ये सब मिल कर बनाते हैं एक सिस्टम जिसे “कार्यरत” कहना मुश्किल है।

और सबसे बड़ी चूक: जब जनता ये सोचती है कि “हमारी सरकार काम कर रही है”, तो असरदार काम बेहद कम नजर आता है। RTI ने तीनों मोर्चों पर उसे ग्राउंड पर उतार कर बुलाया है — हकीकत सामने रखी है।

5. क्या हो सकता है समाधान? — और क्यों अभी जरूरी है?

समाधान आसान नहीं, लेकिन मुमकिन हैं। यहाँ तीन बिंदु हैं:

  1. पारदर्शिता और डेटा खुलना: जैसे अफीम के मामले में खुद CBN ने राशि दी, लेकिन संख्या नहीं रखी — इसे सुधारना होगा।
  2. मानव संसाधन सुदृढ़ करना: प्रदूषण नियंत्रण संस्थाएँ तभी असरदार होंगी जब तकनीशियन-इंजीनियर मौजूद हों। खाली पद क्यों हैं? भर्ती कितनी तेज है?
  3. जवाबदेही बढ़ाना: टेंडर घोटाले में केवल जांच नहीं बल्कि ठोस कार्रवाई दिखनी चाहिए जिससे अगले घोटाले की राह बंद हो जाए। तीनबत्ती वाले सच

और सबसे महत्वपूर्ण — जनता की जागरूकता। जब हम RTI से खुलासों को पढ़ते हैं, तभी हमें सवाल पूछने चाहिए — क्या हमारी सरकार-प्रशासन ने भरोसा खो गया है? क्या हम सही दिशा में हैं?

अगर ये तीन मोर्चे सक्रिय हो जाएँ — डेटा खुला हो, संस्थाएँ मजबूत हों, जांच-निगह बनी रहे — तो अगले दस सालों में देश की तस्वीर बदल सकती है। नहीं तो ये खुलासे सिर्फ अखबारों में रह जाएंगे, ठोस बदलाव नहीं आएगा। तीनबत्ती वाले सच

6. आखिरी शब्द

सब मिलाकर देखें तो RTI ने इस बार कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। अफीम, प्रदूषण, टेंडर — ये सिर्फ अलग-अलग विषय नहीं बल्कि हमारे जीवन-मान, हमारे भरोसे और लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों से जुड़े हैं।

तो अगली बार जब आप टीवी देखें, समाचार पढ़ें, या सोशल मीडिया स्क्रॉल करें — याद रखें कि हकीकत सिर्फ स्क्रीन पर नहीं है, वो हर RTI खुलासे में, हर खाली पद की सूची में, हर टेंडर दस्तावेज़ में छुपी है।

अगर हम इन सवालों को पूछते रहें, जवाब मांगते रहें — तभी बदलाव आएगा। और अगर हम चुप रहेंगे — तो ये खुलासे भी भूल जाने वाली खबर बन कर रह जाएँगे। https://www.aajtak.in/ https://terdingnews.in/sagility-india-ltd/

© 2025 trendingnews.in | लेखक: Nitesh Panwar

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