मोदी-राउत का सियासी
लेखक: Nitesh Panwar | प्रकाशन: terdingnews.in
क्या नरेंद्र मोदी और संजय राउत दुश्मन हैं? या यह सब कुछ सियासी पटकथा का हिस्सा है? जानिए इन दो दिग्गजों की कहानी देसी अंदाज़ में…
मोदी और राउत के रिश्ते में ‘गरमागरमी’ क्यों?
अरे भाई, सबसे पहले तो ये समझ लो कि भारतीय राजनीति एकदम मसालेदार फ़िल्म की तरह है। कभी एक-दूसरे के साथ गरबा करते नेता रातों-रात दुश्मन बन जाते हैं, वहीं कभी जानी दुश्मन भी आंखों में आंखें डालकर चाय पीते नज़र आ जाते हैं। अब इसी कहानी में आ जाते हैं नरेंद्र दामोदरदास मोदी और शिवसेना के फायरब्रांड नेता संजय राउत। मोदी-राउत का सियासी
संजय राउत, जो कभी एनडीए गठबंधन में बीजेपी के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे, आज न सिर्फ़ विपक्ष के स्वरूप में नज़र आते हैं, बल्कि कई बार मोदी सरकार के खिलाफ राजनैतिक हथौड़ा भी चला चुके हैं। लेकिन रुकिए… क्या ये कहानी इतनी सीधी है?
बिलकुल नहीं! क्योंकि राजनीति में ‘दुश्मनी’ भी एक प्रकार का ‘नाटक’ है। कुछ कहने के लिए… और बहुत कुछ छुपाने के लिए!
राउत का बयान: “नरेंद्र मोदी से कोई निजी दुश्मनी नहीं!”
एक ज़माना था जब संजय राउत खुलेआम मंच से भाजपा की शान में कसीदे पढ़ते थे। लेकिन फिर महाराष्ट्र की राजनीति ने ऐसी कलाबाज़ी खाई कि शिवसेना और बीजेपी का रिश्ता टूट गया। इसी के बाद राउत की ज़ुबान से मोदी सरकार के खिलाफ तल्ख़ बयान आने लगे। मोदी-राउत का सियासी
लेकिन फिर अचानक आयी वो बात जिसने सबको चौंका दिया। 2021 में एक बयान में संजय राउत ने कहा— मोदी-राउत का सियासी
नरेंद्र मोदी से हमारा कोई निजी झगड़ा नहीं है। हमारे संबंध परस्पर सम्मान और प्रेम के हैं।”
अरे, ये क्या बात हुई भाई? जो मीडिया में टकराव-टकराव खेल रहे थे, वो अंदर से प्यार-मोहब्बत की बातें कर रहे हैं? राजनीति का गेम तो वहां से ही शुरू होता है जहां असली बातें सामने आती हैं।
क्या मोदी और राउत की ‘सोशल दूरी’ सिर्फ दिखावा है?
राजनीति में एक लाइन बहुत मशहूर है — “आज का दोस्त, कल का विरोधी, और कल का विरोधी फिर से दोस्त बन सकता है।” यह लाइन मोदी और राउत के राजनीतिक रिश्ते को समझने के लिए काफी है।
ये दोनों एक-दूसरे की आलोचना भी करते हैं, लेकिन जब बात आती है इंसानियत की, तो फिर कोई दूरी नहीं बचती। उदाहरण के लिए, जब संजय राउत ने स्वास्थ्य कारणों से कुछ दिनों के लिए राजनीति से दूरी लेने का निर्णय लिया, तो प्रधानमंत्री ने खुद ट्वीट कर उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की। मोदी-राउत का सियासी
ये एक राजनीतिक शिष्टाचार नहीं था, यह एक संकेत था: “विरोध तो रहेगा, पर रंजिश नहीं।”
पॉलिटिकल फ्रेमिंग: विरोध भी, संवेदना भी — यही है खेल!
राजनीति में दो चीजें साथ चलती हैं — पब्लिक स्टैंड और पर्सनल रिलेशन। जो आप मंच से कहते हो, वो जनता के लिए है, और परदे के पीछे जो बात होती है, वो आपसी समझदारी का हिस्सा होती है। संजय राउत और मोदी का रिश्ता भी इसी फ्रेमवर्क में आता है। मोदी-राउत का सियासी
राउत अक्सर मोदी सरकार के खिलाफ़ “पलटवार” करते नज़र आते हैं, लेकिन वह कहते भी हैं कि नरेंद्र मोदी “देश के नेता” हैं और हम उनका सम्मान करते हैं।
यानि कि ये रिश्ता खट्टा भी है, मीठा भी… और सबसे बड़ी बात — राजनीतिक रूप से ज़रूरी भी!
पर्दे के पीछे: मोदी-राउत की सियासी केमिस्ट्री
चलिए जरा गहराई में जाते हैं। सियासत में केमिस्ट्री जरूरी है — और जहां केमिस्ट्री हो वहां बातचीत, समन्वय और कभी-कभी रणनीतिक समर्थन की गुंजाइश हमेशा बनती रहती है।
कुछ मुख्य बातें जो इस ‘अद्भुत’ राजनीतिक संबंध को समझाती हैं: मोदी-राउत का सियासी
- राउत, शिवसेना के चाणक्य माने जाते हैं, जो एक समय केंद्र की NDA सरकार के बड़े समर्थक रहे।
- मोदी, बीजेपी के सर्वेसर्वा और राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में, जिन्हें विरोधी भी कम नहीं आंकते।
- दोनों का संबंध “प्रदेश की राजनीति” में भी कई बार काम आया, और कई बार टकराव का कारण भी बना।
राउत के ट्वीट्स, मोदी के संकेत — एक छुपा हुआ संवाद!
राजनीति में छुपी हुई बातें अक्सर बयानों के बाहर ढूंढनी होती हैं। कभी संजय राउत का सम्मानात्मक ट्वीट, कभी मोदी की शांति वाली मुस्कान — इन संकेतों का मतलब है कि विरोध की तल्ख़ी से ज्यादा… “रिश्तों के पुल” ज़िंदा रखे जा रहे हैं। मोदी-राउत का सियासी
जनता का सवाल: क्या ये सिर्फ़ ‘नौटंकी’ है?
सवाल बड़ा वाजिब है — क्या यह सियासत का कोई नया पन्ना है? या सिर्फ जनता को भ्रमित करने की चाल? ज़रा रुको, दोनों में फर्क यही है कि यह “पॉलिटिकल स्ट्रेटेजी” है।
जहाँ-जहाँ राजनीतिक हित टकराते हैं, वहां जुबानी जंग होती है। लेकिन इस जंग के पीछे भी एक ‘लोकतांत्रिक मर्यादा’ होती है, जो नेताओं के बीच रिश्तों को बनाए रखती है।
और यही असली खेल है पॉलिटिक्स का… “बयान भले बदल जाएं, रिश्ते नहीं टूटते।”
नतीजतन: विरोध के बावजूद ‘पुल’ ज़िंदा हैं
सियासत का खेल ऐसा ही है। भले ही मंच पर तलवारें चलें, मगर पर्दे के पीछे हाथ मिलते रहें, ये जज़्बा दर्शाता है कि राजनीति में व्यक्तिगत रिश्ते एक अलग ही सौदेबाज़ी का हिस्सा होते हैं। मोदी-राउत का सियासी
संजय राउत और नरेंद्र मोदी का रिश्ता भी बिल्कुल ऐसा ही है – खट्टी-मीठी नोकझोंक के साथ चलता एक जटिल लेकिन जीवंत राजनीतिक तालमेल।
और भाई… राजनीति में यही तो असली मसाला है ना?
निष्कर्ष
आज की राजनीति में जहाँ बयानबाज़ी और विवाद सुर्ख़ियों में रहते हैं, वहीं इस लेख में हमने ये बताया कि सियासी विरोध के बावजूद, नेताओं के बीच संवाद और सम्मान ज़िंदा रहते हैं। मोदी और राउत का रिश्ता इसकी मसलन पेश करता है।
नेताओं के बीच की राजनीतिक खींचतान अक्सर दिखाई जाती है, लेकिन जो नहीं दिखता, वो जटिल रिश्ते और रणनीतिक संवाद का हिस्सा होता है — और जनता का इससे वाकिफ़ होना ज़रूरी है। मोदी-राउत का सियासी
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। ज़िंदगी की राह में राजनीति भी फ़िल्म की तरह चलती रहती है — कभी ड्रामा, कभी डायलॉग… और कभी बेमकसद चुप्पी। इसी चुप्पी के अंदर भी कई जवाब छिपे होते हैं।https://terdingnews.in/jiohotstar/ https://www.aajtak.in/topic/narendra-modi
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