हांगकांग का झटका: Hong Kong rainbow rights bill

लेखक: देसी कलम | तारीख: 17 सितम्बर 2025
शुरुआत: शहर जो कभी नहीं सोता, आज बहस में खोया
हांगकांग—एशिया का चमकता मोती, वित्तीय राजधानी और नीयन लाइट्स का शहर। लेकिन इस बार सुर्खियां इसकी स्काईलाइन या बिजनेस रिकॉर्ड नहीं, बल्कि एक सामाजिक मुद्दे ने बटोरीं। 10 सितम्बर 2025 को हांगकांग की लीगिस्लेटिव काउंसिल (LegCo) ने “Registration of Same-Sex Partnerships Bill” को भारी बहुमत से ठुकरा दिया। ये वही बिल था जो विदेशी या लोकल समलैंगिक जोड़ों को सीमित कानूनी अधिकार देता। और भाई, इसके बाद तो सोशल मीडिया से लेकर चाय के ढाबों तक हर जगह यही चर्चा। हांगकांग का झटका:
बिल क्या था? – आसान भाषा में समझिए LGBTQ rights Hong Kong
सरकार ने जुलाई 2025 में यह प्रस्ताव रखा था कि हांगकांग में ऐसे कपल्स, जिन्होंने विदेश में शादी या “सिविल यूनियन” की हो, उन्हें कुछ बुनियादी अधिकार मिलें। इनमें शामिल थे:
- मेडिकल आपातकाल में पार्टनर का निर्णय लेने का अधिकार।
- मृत्यु के बाद संपत्ति पर कुछ हक़।
- कुछ टैक्स और इमीग्रेशन रियायतें।
ध्यान रहे, यह “विवाह समानता” (Marriage Equality) का बिल नहीं था, बल्कि सिर्फ़ सीमित दर्जे का कानूनी फ्रेमवर्क। अदालत ने 2023 में आदेश दिया था कि सरकार को ऐसा ढांचा बनाना ही होगा। यानी सरकार अदालत के निर्देश का पालन कर रही थी। हांगकांग का झटका:
क्यों हुआ इतना विरोध?
विरोध के पीछे कई कारण हैं। पारंपरिक समूहों और कुछ धार्मिक संगठनों का कहना है कि यह कदम पारिवारिक मूल्यों के खिलाफ है। “एक पुरुष और एक स्त्री” वाली शादी की परंपरा पर खतरा बताया गया। कुछ विधायकों ने इसे “पश्चिमी एजेंडा” का असर कहकर खारिज किया। लीगिस्लेटिव काउंसिल के 90 में से 71 सदस्य इस बिल के खिलाफ गए। हांगकांग का झटका:
वहीं दूसरी ओर, LGBTQ+ संगठनों ने इसे अधिकारों की खुली अवहेलना कहा। उनका कहना है कि यह फैसला न केवल न्यायालय के आदेश के खिलाफ है बल्कि आधुनिक समाज की जरूरतों से भी दूर भागता है।
मतदान का नतीजा – आंकड़े जो चौंकाते हैं
10 सितम्बर को हुए मतदान में 71 ने विरोध, 14 ने समर्थन और 1 सदस्य ने तटस्थ रहते हुए वोट डाला। खास बात यह है कि यह सरकार का खुद का प्रस्ताव था और फिर भी इसे इतनी भारी हार का सामना करना पड़ा। यह हांगकांग की राजनीति में दुर्लभ घटना है। हांगकांग का झटका:
सोशल मीडिया की गूंज – देसी स्टाइल रिएक्शन
ट्विटर, इंस्टाग्राम, रेडिट जैसी साइटों पर #HongKongEquality और #RightsMatter जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। किसी ने लिखा, “यह हांगकांग के लिए एक सुनहरा मौका था जो हाथ से निकल गया।” किसी ने कहा, “सिर्फ कानून नहीं, समाज की सोच बदलनी चाहिए।” भारतीय प्रवासियों ने भी अपनी राय रखी। कुछ ने कहा, “समाज को धीरे-धीरे बदलना होगा, झटके से नहीं।” हांगकांग का झटका:
कानूनी पेंच – अदालत का आदेश और सरकार की मुश्किल

2023 में हांगकांग की कोर्ट ऑफ फाइनल अपील ने साफ कहा था कि सरकार को समान-लिंग जोड़ों के लिए वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था बनानी ही होगी। अब जब बिल गिर गया है, तो सवाल उठता है कि सरकार अदालत की बात कैसे मानेगी? क्या नया बिल आएगा? या अदालत को फिर से दखल देना पड़ेगा? हांगकांग का झटका:
ग्राउंड रिपोर्ट – लोगों की आवाज़
स्थानीय कैफे, यूनिवर्सिटी कैंपस और मेट्रो में बातचीत करने पर पता चला कि युवा वर्ग इस बिल के पक्ष में था। एक छात्रा ने कहा, “हम दुनिया के सबसे आधुनिक शहरों में से हैं, पर सोच अभी भी पीछे है।” वहीं, एक बुजुर्ग दुकानदार बोले, “परिवार की परिभाषा भगवान ने बनाई है, कानून नहीं।” यह विरोधाभास हांगकांग समाज की जटिलता दिखाता है। हांगकांग का झटका:
भारतीय नजरिया – प्रवासियों की राय
हांगकांग में करीब 40,000 भारतीय रहते हैं। बहुत से युवाओं ने सोशल मीडिया पर लिखा कि “भारत में भी बदलाव की हवा चल रही है, हांगकांग को भी आगे बढ़ना चाहिए।” कुछ ने यह भी जोड़ा कि “हर देश की अपनी गति होती है, मजबूर नहीं किया जा सकता।” हांगकांग का झटका:
आर्थिक और राजनीतिक असर
निवेशकों के लिए यह सामाजिक फैसला सीधे आर्थिक मुद्दा नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय छवि पर असर पड़ सकता है। ग्लोबल ह्यूमन राइट्स इंडेक्स में हांगकांग को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं। यह फैसला विदेशी निवेशकों के बीच “प्रोग्रेसिविटी” को लेकर धुंधला संदेश दे सकता है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
अमेरिका, यूरोपीय संघ और कई मानवाधिकार संगठनों ने निराशा जताई। उन्होंने कहा कि एशिया के प्रमुख वित्तीय केंद्र को अधिक समावेशी होना चाहिए। चीन की केंद्रीय सरकार ने इसे “स्थानीय मामला” बताकर टिप्पणी से बचा लिया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग की अप्रत्यक्ष सोच ने माहौल को प्रभावित किया। हांगकांग का झटका:
भविष्य की राह
अब विकल्प दो हैं:
- सरकार संशोधित बिल पेश करे, जिसमें कुछ और सीमाएँ या बदलाव हों।
- अदालत खुद नया आदेश देकर सरकार को बाध्य करे।
दोनों ही रास्ते आसान नहीं। लेकिन एक बात तय है कि यह बहस यहीं खत्म नहीं होगी। सोशल मीडिया और युवा पीढ़ी लगातार आवाज़ उठा रही है। हांगकांग का झटका:
देसी सारांश – सीख क्या है?
भारत जैसे देशों के लिए भी यह घटना सबक है। समाज और कानून की चाल एक जैसी नहीं होती। बदलाव की मांग तेज है, पर स्वीकृति धीरे-धीरे आती है। हांगकांग का मामला बताता है कि प्रगति के रास्ते में बहस और असहमति जरूरी है। https://www.newstak.in/politics https://terdingnews.in/urban-company-ipo/
लेखक Nitesh Panwar | © terdingnews.in