माँ का अनमोल व्रत — अहोई अष्टमी

लेखक: Nitesh Panwar | Copyright © terdingnews.in

हिंदू धर्म में माता-पुत्र के प्रेम को व्यक्त करने वाला एक ऐसा व्रत है, जिसका नाम सुनते ही मन में श्रद्धा और चित्त में विरल सी एक प्रगाढ़ अनुभूति जाग जाती है — अहोई अष्टमी. यह दिन उन माताओं का दिन है जो अपने बच्चों की लंबी उम्र, सुख-शांति और रक्षा की कामना लेकर निर्जल व्रत रखती हैं। पर क्या आप जानते हैं इस व्रत की पौराणिक कथा, रहस्य और महत्व? आइए, हम इस लेख में गहराई से उतरें और जानें वो सब कुछ जो आमतः पता नहीं होता। माँ का अनमोल व्रत — अहोई अष्टमी

अहोई अष्टमी: तिथि, समय और परिचय

अहोई अष्टमी, जिसे “अहोई आठे” भी कहा जाता है, हिन्दू तिथि-पत्र के अनुसार **कात‍िक माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि** को मनाई जाती है।

  • 2025 में यह व्रत **13 अक्टूबर, सोमवार** को रखा गया है।
  • पूजा मुहूर्त इस दिन **दोपहर समय से शुरू होकर सांध्य काल तक** माना जाता है — लगभग शाम 5:53 बजे से लेकर 7:08 बजे तक।
  • उद्गार (तारादर्शन / चंद्रदर्शन) का समय भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि व्रत उसी समय खुलता है।

इस दिन की विशेषता यह है कि पूजन और व्रत के दौरान मन को अति संयम, श्रद्धा और विनय से भरा जाना चाहिए — क्योंकि यह दिन न केवल धार्मिक है, बल्कि आस्था, आत्मशुद्धि और माँ–बच्चे के बंधन का प्रतीक भी है। माँ का अनमोल व्रत — अहोई अष्टमी

पौराणिक कथा: अाहोई अष्टमी की रहस्य भरी कहानी

कथा जिसे सुनते-देखते पीढ़ियाँ बीत गईं, वह अगम है, लेकिन हर बार उसमें नया अर्थ मिलता है। कहते हैं: माँ का अनमोल व्रत — अहोई अष्टमी

कथा की शुरुआत

प्राचीन समय में एक साहूकार रहता था, जिसके **सात बेटे** और **एक बेटी** थीं। दिवाली से कुछ दिन पहले जब घर को सजाने-ठ ही करने का समय आया, तो बहुएँ और उनकी ननद मिट्टी लेने जंगल गईं।

वहीँ एक जगह मिट्टी खोदते समय ननद की खुरपी चुभकर एक **श्याहु (स्याहु / साही) प्राणी का बच्चा** मारा गया — अनजाने में। कृष्ण पक्ष की अष्टमी के पूर्व यह दुर्भाग्य हुआ। माँ का अनमोल व्रत — अहोई अष्टमी

शाप और त्रासदी

श्याहु बहुत क्रोधित हुआ और उसने कहा कि तुम्हारी कोख आज से उदास और सुनसान हो जाएगी — और सचमुच अगले समय में उन सात पुत्रों की मृत्यु हो गई।

शोक और पश्चाताप में वो ननद और उसके पति जंगल की ओर चले गए, आत्महत्या तक की सोचने लगे। तभी आकाशवाणी हुई — वे वापस लौटें, अहोई माता की सेवा करें, और उनके बच्चों के लिए व्रत धारण करें। माँ का अनमोल व्रत — अहोई अष्टमी

पूजा, माफी और आशीर्वाद

ननद ने माता अहोई का व्रत विधिपूर्वक किया — मिट्टी में चित्रांकन किया, माता को पकवान अर्पित किये, मनोकालिका की शुद्ध श्रद्धा से प्रार्थना की। मां उससे प्रसन्न हुईं और बृहत्तर करुणा दिखाते हुए उन बच्चों को पुनः जीवनदान दिया।

तब से, यह व्रत उन माताओं के लिए शुभ माना जाता है जो अपने बच्चों की लंबी उम्र, सुख और रक्षा की कामना करें। इस कथा में हमारी मानवता, विश्वास और माँ का त्याग झलकता है।

महत्व और प्रेरणा: केवल एक व्रत नहीं, एक संदेश

इस व्रत का धार्मिक महत्व तो जग जाहिर है, लेकिन इसके पीछे कुछ गहरे संदेश भी छिपे हैं: माँ का अनमोल व्रत — अहोई अष्टमी

  1. पाप और पश्चाताप के बीच साम्य: अनजाने में हुई भूल को स्वीकार करना और सुधार का पथ चुनना — यही मानवता है।
  2. माँ की अनन्य श्रद्धा: अपने बच्चों की रक्षा, जीवन और भला खयाल रखने का अटूट बंधन।
  3. संयम और आत्मशुद्धि: निर्जल व्रत और भक्ति से मन को नियंत्रित करना और कर्मों की सफाई।
  4. समाज में चेतना: जान-समझकर कार्य करने का पाठ — अनजाने क्रियाएं भी भारी परिणाम ला सकती हैं।

इस तरह यह व्रत माँ और बच्चों के बीच एक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक पुल बनाता है। माँ का अनमोल व्रत — अहोई अष्टमी

पूजा-विधि : कैसे करें अहोई अष्टमी का व्रत? (चरणबद्ध)

यदि आप इस वर्ष अहोई अष्टमी व्रत करने का मन बना रही हैं, तो निम्न विधि का अनुसरण करें — पवित्र, सरल और श्रद्धापूर्वक:

पूर्व तैयारी (मां की चिन्ता)

  • व्रत से एक दिन पहले घर की सफाई करें और पूजा स्थल को स्वच्छ करें।
  • अगर संभव हो, मिट्टी से बनाई गई एक **अलपना / कोहर** बनाएं — जिसमें अहोई माता का चिह्न हो। माँ का अनमोल व्रत — अहोई अष्टमी
  • पूजा सामग्री जैसे दीप, अगरबत्ती, फूल, हल्दी, कुमकुम, अक्षत (गुड़-चावल मिश्रण), गौघृत, हलवा–पूआ आदि तैयार रखें। माँ का अनमोल व्रत — अहोई अष्टमी
  • अगर आपके परिवार में यह परम्परा हो, तो एक **सिल्वर/गोल्डन सिक्का माला** पूर्व वर्ष से तैयार रखें।

व्रत दिन की विधि

  1. सवेरे जल्दी उठें, स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र पहनें। मन को शांत रखें।
  2. संकल्प लें: “मैं अहोई अष्टमी का व्रत श्रीमान/श्रीमती बच्चे की लंबी उम्र, सुख-शांति एवं रक्षा हेतु रख रही हूँ।” — इस संकल्प को मन में दृढ़ विश्वास से लें।
  3. पूजा स्थल पर मिट्टी रखी हुई कोहल (यदि हो) पर माता की आकृति बनाएं या मां की छोटी थाली/चित्र रखें।
  4. दीप, अगरबत्ती, फूल, नैवेद्य आदि अर्पित करें। “जय अहोई माता” की ध्वनि से आरती करें।
  5. दिनभर निर्जल व्रत (खाना-पीना नहीं) रखें — केवल आध्यात्मिक भाव में रहें।
  6. सांध्य समय में तारों या चांद के दर्शन होते ही व्रत तोड़ें। — पूजन के बाद फल, प्रसाद आदि ग्रहण करें। माँ का अनमोल व्रत — अहोई अष्टमी

नोट: यदि तारों को देखना कठिन हो, तो चंद्रमा के दर्शन के बाद भी व्रत तोड़ा जा सकता है (परंपरा अनुसार).

पूजन सामग्री (सम्पूर्ण सूची)

सामग्रीउद्देश्य / विवरण
गाय के पत्ते / साफ मिट्टीपूजा आधार
हल्दी, कुमकुम, अक्षतसंस्कार अर्पण हेतु
दीप, घीप्रकाश का प्रतीक
अगरबत्ती / धूपशुद्धता और वातावरण निर्मल करना
फूल, बेलपत्रसौंदर्य एवं श्रद्धा
हलवा, पूआ, फल, मिठाईनैवेद्य (माता को अर्पण)
सिल्वर/गोल्डन सिक्का माला (यदि हो)परिवार की समृद्धि और आशीर्वाद का प्रतीक

व्रत के लाभ एवं आशय

माना जाता है कि यदि यह व्रत श्रद्धापूर्वक किया जाए, तो निम्न लाभ प्राप्त होते हैं:

  • संतान की दीर्घायु एवं स्वास्थ्य — विशेष रूप से कमजोर अवस्था से मुक्ति।
  • माँ-पुत्र संबंध में अटूट स्नेह और विश्वास की वृद्धि।
  • कर्मों की शुद्धि — भोलेपने की भूलों का प्रायश्चित।
  • मन की स्थिरता, आत्मशांति और आध्यात्मिक उन्नति।

इस व्रत में “श्रद्धा” वह मूल है, और “निष्ठा” वह ध्वजा है। यदि मन पवित्र हो, तो व्रत सच्चे फल देता है।

लोकाचार और विविधताएँ

अहोई अष्टमी का पर्व पूरे भारत में विभिन्न रूपों से मनाया जाता है, और हर क्षेत्र में अपनी एक बात होती है: माँ का अनमोल व्रत — अहोई अष्टमी

  • कुछ स्थानों पर माँ की आकृति मिट्टी पर बनाई जाती है, तो कहीं कपड़े पर चित्रित किया जाता है।
  • कुछ परिवारों में यह व्रत विशेष रूप से बेटियों के लिए भी किया जाता है — यानी “सभी संतान” की रक्षा हेतु।
  • कहीं चाँद के दर्शन के बाद व्रत तोड़ा जाता है, तो कहीं तारों का दर्शन ही मुख्य माना जाता है।
  • कई इलाकों में यह व्रत कारवाचौथ + 4 दिन बाद मनाया जाता है — क्योंकि दिवाली के करीब आता है।

कुछ रोचक तथ्य जो शायद आपने नहीं सुना

  1. “अहोई” शब्द का अर्थ भी दिलचस्प है — “अनहोनी को होनी” मांगने का आग्रह।
  2. अहोई माता को कभी-कभी लक्ष्मी भगवती से भी जोड़ा जाता है — क्योंकि माँ ही धन-धान्य, संतति और सौभाग्य की मूल हैं।
  3. व्रत तोड़ते समय सिक्का माला जोड़ने की परम्परा कुछ घरों में आज भी चली आ रही है — जिससे परिवार की वृद्धि और समृद्धि बनी रहे।
  4. कथा में प्रयुक्त “श्याहु / स्याहु / साही” शब्द विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग रूपों में मिलता है — यह एक जीव-प्राणी देवी की रूपरेखा प्रतीत होती है।

व्रत के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें

  • व्रत में शुद्धता आवश्यक — नकारात्मक विचार, झूठी बातें, अनावश्यक विवाद से बचें।
  • दिनभर ह्रदय को शांत रखें, ध्यान-भजन या माता का स्मरण करते रहें।
  • यदि स्वास्थ्य कारणों से पूरी निर्जला व्रत संभव न हो, तो आंशिक व्रत या सद्भावपूर्वक अन्य उपाय करें।
  • व्रत तोड़ते समय कृषि या प्राकृतिक प्रदूषण, तारा/चाँद की स्थिति आदि की परवाह करें।

समापन में — एक माँ की प्रार्थना

हमारी संस्कृति में माँ का स्थान दिव्य है और उसकी श्रद्धा उसने अपने बच्चों के लिए खोला है। अहोई अष्टमी केवल एक व्रत नहीं है — यह एक *संघर्ष, संस्मरण और आध्यात्मिक उपहार* है। हर वह माँ जो इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करती है, वो एक अनमोल संदेश देती है — कि प्यार, संयम और विश्वास से बड़े से बड़े संकट का सामना किया जा सकता है।

इस दिव्य दिन पर मैं यही कामना करता हूँ कि हर माँ की ओर से उठी प्रार्थना स्वर्ग लोक तक पहुंचे। यदि इस वर्ष आप अहोई अष्टमी व्रत रखें, तो पूरी श्रद्धा और सौम्यता से करें, क्योंकि यही व्रत वास्तविकता में माँ और बच्चों के बंधन को अमर बनाता है। https://terdingnews.in/india-women-vs-australia-women-match-report-2025/ https://www.aajtak.in/

— Nitesh Panwar

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