बेंगलुरु फैक्ट्री हादसा:

लेखक: Nitesh Panwar |
हादसे की शुरुआत: चंद सेकंड में सबकुछ तबाह
बेंगलुरु की औद्योगिक इलाके में उस सुबह लोग रोज़ की तरह काम पर आए थे। मशीनें चल रही थीं, लोग अपने-अपने काम में लगे थे। लेकिन अचानक तेज धमाके जैसी आवाज़ आई और देखते ही देखते पूरी फैक्ट्री में आग की लपटें फैल गईं। लोगों ने चिल्लाना शुरू किया, अफरा-तफरी मच गई, और हर कोई अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगा। लेकिन इस भगदड़ में 5 लोग ऐसे भी थे जिनकी किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया।बेंगलुरु फैक्ट्री हादसा:
आँखों देखा हाल: गवाहों की जुबानी
गवाहों के मुताबिक, आग इतनी तेज थी कि 10 मिनट के अंदर ही पूरी इमारत धुएं और लपटों में घिर गई। आस-पास के मजदूरों ने बताया कि कई लोगों ने खिड़कियों से कूदकर जान बचाई। जो बच नहीं पाए, वो धुएं और गर्मी में फँस गए। एक मजदूर ने कहा – “हमने कोशिश की दरवाज़े खोलने की, लेकिन अंदर का तापमान इतना ज्यादा था कि हम टिक ही नहीं पाए।” बेंगलुरु फैक्ट्री हादसा:
फायर ब्रिगेड की जंग
फायर ब्रिगेड को सूचना मिलते ही कई गाड़ियाँ मौके पर पहुँचीं। दमकलकर्मियों ने घंटों की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पाँच लोग ज़िंदा जल चुके थे। शवों को निकालते वक्त भी दमकलकर्मी और पुलिसकर्मी भावुक हो उठे। बेंगलुरु फैक्ट्री हादसा:
जिम्मेदारी किसकी?
अब सवाल ये है कि आखिर इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हुई। क्या फैक्ट्री में फायर सेफ्टी के इंतज़ाम नहीं थे? क्या अलार्म और स्प्रिंकलर काम नहीं कर रहे थे? पुलिस और प्रशासन ने जाँच शुरू कर दी है। शुरुआती रिपोर्ट्स बता रही हैं कि फैक्ट्री में सेफ्टी स्टैंडर्ड्स का पालन नहीं किया गया था। अगर ये सच है, तो ये हादसा किसी प्राकृतिक वजह से नहीं बल्कि इंसानी लापरवाही की वजह से हुआ है। बेंगलुरु फैक्ट्री हादसा:
परिवारों का दर्द
जो लोग मारे गए वो साधारण परिवारों से आते थे। कोई घर का अकेला कमाने वाला बेटा था, कोई अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए काम कर रहा था। अब उनके परिवारों के सामने ज़िंदगी का सबसे बड़ा संकट है। एक मृतक की माँ ने रोते हुए कहा – “मेरा बेटा सुबह निकला था कहकर कि शाम को दूध ले आएगा, लेकिन वो वापस ही नहीं आया।” बेंगलुरु फैक्ट्री हादसा:
औद्योगिक सुरक्षा पर सवाल
ये हादसा सिर्फ बेंगलुरु का नहीं बल्कि पूरे देश की फैक्ट्री सुरक्षा पर बड़ा सवाल है। भारत में हर साल सैकड़ों लोग फैक्ट्री हादसों में जान गँवाते हैं। लेकिन हर बार जाँच, रिपोर्ट और वादे होते हैं, ज़मीनी बदलाव नहीं। आखिर कब तक मजदूर अपनी जान की बाज़ी लगाकर काम करते रहेंगे? सरकार को अब कड़े कानून और सख्त अमल की ज़रूरत है। बेंगलुरु फैक्ट्री हादसा:
आँकड़े और पुरानी घटनाएँ
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट बताती है कि देश में औद्योगिक हादसों में हर साल 800 से ज़्यादा मौतें होती हैं। बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली और चेन्नई जैसे औद्योगिक शहरों में ये घटनाएँ आम हो चुकी हैं। हाल के सालों में दिल्ली के अनाज मंडी हादसे और मुंबई की कई फैक्ट्रियों में आग लगने की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं।
अंतरराष्ट्रीय तुलना
अगर हम अमेरिका, जापान और जर्मनी जैसे देशों से तुलना करें, तो वहाँ फैक्ट्रियों में फायर सेफ्टी का स्तर बहुत ऊँचा है। वहाँ हर छोटे से छोटे कारखाने में अलार्म, स्प्रिंकलर और सेफ्टी ड्रिल्स अनिवार्य हैं। जबकि भारत में नियम तो हैं, लेकिन उनका पालन बहुत कम होता है। यही वजह है कि यहाँ हादसे ज़्यादा होते हैं।
आगे क्या?
इस हादसे के बाद प्रशासन ने जाँच के आदेश दिए हैं और पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा देने की घोषणा की है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या मुआवज़ा ही काफी है? क्या हमें सिस्टम में बदलाव नहीं करना चाहिए ताकि अगली बार किसी और परिवार की रोटी कमाने वाली उम्मीद यूँ राख न हो जाए?
निष्कर्ष
बेंगलुरु फैक्ट्री हादसा सिर्फ पाँच लोगों की मौत की खबर नहीं है, ये हमारी व्यवस्था की खामियों का आईना है। मजदूरों की सुरक्षा, फैक्ट्री मालिकों की जिम्मेदारी और प्रशासन की नीयत – इन तीनों पर अब सवाल उठ चुके हैं। अगर हम अब भी नहीं चेते, तो अगली बार शायद मौतों का ये आँकड़ा और बड़ा होगा। https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/jalore/news/bengaluru-nagarpet-building-fire-accident-jalore-family-death-case-madan-singh-rajpurohit-135688323.html https://terdingnews.in/mumbai-barish-imd-red-alert-2025/
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